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राज्यसभा की प्रासंगिकता

राज्यसभा की प्रासंगिकता कई मायनों में है:- लोकसभा के अधिकांश प्रतिनिधि बहुमत वाले दल से चयनित होते हैं ऐसे में अपने राजनीतिक लाभ के लिये ये विधियों के निर्माण में निरंकुश हो सकते हैं। यह सदन निम्न सदन की निरंकुशता पर रोक लगाती है और कानून निर्माण की प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक लोकतांत्रिक बनाता है। लोकसभा में अत्यधिक कार्यभार के चलते हर विधेयक को यथोचित समय नही मिल पाता, इस दृष्टि से राज्यसभा विधेयक की जांच परख में एक अन्य चेक पोस्ट का काम करती है। वित्तीय विधेयकों के मामले में  राज्यसभा लोकसभा को बहुमूल्य सुझाव प्रदान कर इसकी समस्याओं का समाधान करती है। राज्यसभा में अनुभवी एवं दक्ष लोगों को मनोनीत किए जाने के प्रावधान भी हैं। इससे विभिन्न मामलों में विधेयकों पर विशेषज्ञों की राय मिल पाती है जिससे विधेयक की प्रभाविता में वृद्धि होती है। जो लोग यद्यपि योग्य कुशल व अनुभवी होते है, परंतु वो जन समर्थन से ससद पहुंच पाने में असफल रहते हैं, उनकी योग्यता का लाभ लेने के लिए उनको राज्यसभा के माध्यम से भेजा जाता है।इस दृष्टि से राज्यसभा बहुत जरूरी अंग है। इसके अलावा यह केंद्र के अनावश्यक हस्...

भारत मे चुनाव सुधार

वर्ष 2000 से पूर्व चुनाव सुधार संविधान के 61वें संशोधन अधिनियम, 1989 के तहत अनुच्छेद 326 में संशोधन करके मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई। चुनाव कार्यों में लगे अधिकारी, कर्मचारियों को चुनाव की अवधि के दौरान चुनाव आयोग में प्रतिनियुक्ति पर माना जाएगा। इस अवधि में ये कर्मी चुनाव आयोग के नियंत्रण में रहेंगे। नामांकन पत्रों को लेकर प्रस्तावकों की संख्या में 10 फीसदी का इज़ाफा किया गया। राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 का अपमान करने पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना। दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना और उम्मीदवार की मौत पर चुनाव स्थगित न होना। इस चरण में अब तक के सबसे बड़े चुनाव सुधारों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का प्रचलन में आना शामिल है। इसका लक्ष्य चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष, सटीक और पारदर्शी बनाना है जिससे प्राप्त परिणामों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जा सके। अतः सार्वजनिक क्षेत्र के दो उपक्रमों भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बंगलुरू) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (हैदराबाद) के सहयोग से भारत के चुनाव आयोग द्वारा EV...

केशवानंद भारती वाद व संविधान का मूल ढांचा

केशवानंद भारती वाद व मूल ढांचा सिद्धान्त (1973):-  ■ स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘ शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार वाद’ (1951) और ‘ सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार वाद’ (1965) में निर्णय देते हुए संसद को संविधान में संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्रदान की।  ■ बाद के वर्षों में जब सत्तारुढ़ सरकार ने अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिये संविधान संशोधन जारी रखा तो गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार वाद (1967) में अपने पुराने निर्णयों को बदलते हुए निर्णय दिया कि संसद के पास मौलिक अधिकारों को संशोधित करने की शक्ति नहीं है। ■ 1973 में केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13-सदस्यीय खंडपीठ ने 7-6 से निर्णय दिया कि संसद को संविधान की मूल संरचना में परिवर्तन करने से रोका जाना चाहिये। ●खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि हालांकि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है परंतु संविधान के कुछ हिस्से इतने अंतर्निहित और महत्त्वपूर्ण हैं कि उन्हें संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है। ● सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 368 जो कि संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्तियाँ प्रदान ...