राज्यसभा की प्रासंगिकता
राज्यसभा की प्रासंगिकता कई मायनों में है:-
- लोकसभा के अधिकांश प्रतिनिधि बहुमत वाले दल से चयनित होते हैं ऐसे में अपने राजनीतिक लाभ के लिये ये विधियों के निर्माण में निरंकुश हो सकते हैं। यह सदन निम्न सदन की निरंकुशता पर रोक लगाती है और कानून निर्माण की प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक लोकतांत्रिक बनाता है।
- लोकसभा में अत्यधिक कार्यभार के चलते हर विधेयक को यथोचित समय नही मिल पाता, इस दृष्टि से राज्यसभा विधेयक की जांच परख में एक अन्य चेक पोस्ट का काम करती है।
- वित्तीय विधेयकों के मामले में राज्यसभा लोकसभा को बहुमूल्य सुझाव प्रदान कर इसकी समस्याओं का समाधान करती है।
- राज्यसभा में अनुभवी एवं दक्ष लोगों को मनोनीत किए जाने के प्रावधान भी हैं। इससे विभिन्न मामलों में विधेयकों पर विशेषज्ञों की राय मिल पाती है जिससे विधेयक की प्रभाविता में वृद्धि होती है।
- जो लोग यद्यपि योग्य कुशल व अनुभवी होते है, परंतु वो जन समर्थन से ससद पहुंच पाने में असफल रहते हैं, उनकी योग्यता का लाभ लेने के लिए उनको राज्यसभा के माध्यम से भेजा जाता है।इस दृष्टि से राज्यसभा बहुत जरूरी अंग है।
- इसके अलावा यह केंद्र के अनावश्यक हस्तक्षेप को रोककर राज्यों के हितों की रक्षा करती है।
- अनु 249 (राज्य सूची के विषय को राष्ट्रीय महत्व का घोषित करना) व अनु 312 (अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन) की शक्तियां केवल राज्य सभा को ही प्राप्त है, लोकसभा को नहीं।
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