केशवानंद भारती वाद व संविधान का मूल ढांचा

केशवानंद भारती वाद व मूल ढांचा सिद्धान्त(1973):- 
■ स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार वाद’ (1951) और ‘सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार वाद’ (1965) में निर्णय देते हुए संसद को संविधान में संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्रदान की। 
■ बाद के वर्षों में जब सत्तारुढ़ सरकार ने अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिये संविधान संशोधन जारी रखा तो गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार वाद (1967) में अपने पुराने निर्णयों को बदलते हुए निर्णय दिया कि संसद के पास मौलिक अधिकारों को संशोधित करने की शक्ति नहीं है।
■ 1973 में केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13-सदस्यीय खंडपीठ ने 7-6 से निर्णय दिया कि संसद को संविधान की मूल संरचना में परिवर्तन करने से रोका जाना चाहिये।
●खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि हालांकि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है परंतु संविधान के कुछ हिस्से इतने अंतर्निहित और महत्त्वपूर्ण हैं कि उन्हें संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है।
● सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 368 जो कि संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्तियाँ प्रदान करता है, के तहत संविधान की आधारभूत संरचना में बदलाव नहीं किया जा सकता है। 
‘मूल संरचना’ का सिद्धांत-(Basic Structure Doctrine):-
बुनियादी संरचना क्या है, यह निरंतर विचार-विमर्श का विषय रहा है। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘मूल संरचना’ को परिभाषित नहीं किया, किंतु संविधान की कुछ विशेताओं को ‘मूल संरचना’ के रूप निर्धारित किया है, जिसमें संघवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र, मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा आदि शामिल हैं। तब से इस सूची का निरंतर विस्तार किया जा रहा है।

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