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भारत की परमाणु नीति

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परिचय - भारत एक परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है।जिसका प्रदर्शन वह 1974 व 1998 में दे चुका है।परंतु भारत की परमाणु नीति " No-First-Use " की अपनाई है।प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में इस नीति के 3 प्रमुख बिंदु बतलाये:- 1. भारत कभी भी किसी गैर परमाणु सम्पन्न राज्य पर न तो परमाणू हमले की धमकी देगा व न ही उसके विरुद्ध इसका प्रयोग ही करेगा। 2. यदि कोई भारत के खिलाफ भयंकर जनसंहारक अस्त्रों(Chemical - Bio Weapons) का प्रयोग करेगा, तो फिर भारत भी असीमित ताकत के साथ उसके खिलाफ बड़ा आण्विक अभियान करेगा। 3. भारत किसी भी राष्ट्र पर पहले परमाणु हमला नहीं करेगा। पक्ष में तर्क - - यह भारत की उदार व उत्तरदायित्वपूर्ण परमाणु नीति का परिचायक है। - भारत की परमाणु नीति सुरक्षार्थ है, न कि आक्रमनार्थ। विपक्ष में तर्क- - NFU के कारण किसी परमाणु राष्ट्र द्वारा पहले हमला कर देने पर भारत के पास पलटवार के लिए बहुत कम समय रहता है। - अगर पहला हमला ही अति भीषण हो तो दूसरे मौके की संभावना नगण्य रह जाती है। न्यूनतम निवारण क्षमता (Minimum Deterrence)- इसका तातपर्य है कि भारत द्वारा परमाण...

राज्यसभा की प्रासंगिकता

राज्यसभा की प्रासंगिकता कई मायनों में है:- लोकसभा के अधिकांश प्रतिनिधि बहुमत वाले दल से चयनित होते हैं ऐसे में अपने राजनीतिक लाभ के लिये ये विधियों के निर्माण में निरंकुश हो सकते हैं। यह सदन निम्न सदन की निरंकुशता पर रोक लगाती है और कानून निर्माण की प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक लोकतांत्रिक बनाता है। लोकसभा में अत्यधिक कार्यभार के चलते हर विधेयक को यथोचित समय नही मिल पाता, इस दृष्टि से राज्यसभा विधेयक की जांच परख में एक अन्य चेक पोस्ट का काम करती है। वित्तीय विधेयकों के मामले में  राज्यसभा लोकसभा को बहुमूल्य सुझाव प्रदान कर इसकी समस्याओं का समाधान करती है। राज्यसभा में अनुभवी एवं दक्ष लोगों को मनोनीत किए जाने के प्रावधान भी हैं। इससे विभिन्न मामलों में विधेयकों पर विशेषज्ञों की राय मिल पाती है जिससे विधेयक की प्रभाविता में वृद्धि होती है। जो लोग यद्यपि योग्य कुशल व अनुभवी होते है, परंतु वो जन समर्थन से ससद पहुंच पाने में असफल रहते हैं, उनकी योग्यता का लाभ लेने के लिए उनको राज्यसभा के माध्यम से भेजा जाता है।इस दृष्टि से राज्यसभा बहुत जरूरी अंग है। इसके अलावा यह केंद्र के अनावश्यक हस्...

केशवानंद भारती वाद व संविधान का मूल ढांचा

केशवानंद भारती वाद व मूल ढांचा सिद्धान्त (1973):-  ■ स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘ शंकरी प्रसाद बनाम भारत सरकार वाद’ (1951) और ‘ सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार वाद’ (1965) में निर्णय देते हुए संसद को संविधान में संशोधन करने की पूर्ण शक्ति प्रदान की।  ■ बाद के वर्षों में जब सत्तारुढ़ सरकार ने अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिये संविधान संशोधन जारी रखा तो गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार वाद (1967) में अपने पुराने निर्णयों को बदलते हुए निर्णय दिया कि संसद के पास मौलिक अधिकारों को संशोधित करने की शक्ति नहीं है। ■ 1973 में केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13-सदस्यीय खंडपीठ ने 7-6 से निर्णय दिया कि संसद को संविधान की मूल संरचना में परिवर्तन करने से रोका जाना चाहिये। ●खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि हालांकि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है परंतु संविधान के कुछ हिस्से इतने अंतर्निहित और महत्त्वपूर्ण हैं कि उन्हें संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है। ● सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 368 जो कि संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्तियाँ प्रदान ...