हरित क्रांति - वरदान या अभिशाप

परिभाषा-
        हरित क्रांति का अभिप्राय उस घटना से है, जिसमें कृषि क्षेत्र में उन्नत तकनीक, उन्नत बीजों, उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि यंत्रों व मशीनों इत्यादि की मदद से उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई, एवं लाखों लोगों को भुखमरी से बचाया जा सका।
         भारत में हरित क्रांति का पुरोधा एम एस स्वामीनाथन को कहा जाता है।इन्होंने 1966-67 में उस समय हरित क्रांति की नींव रखी, जब देश लगातार अकाल के कारण भुखमरी के गर्त में पड़ा था।इन्होंने गेंहू की अत्यंत उन्नत किस्में- कल्याण सोना, शरबती, सोनालिका - विकसित की, जिसके चलते गेंहू का उत्पादन अभूतपूर्व तरीके से बढ़ गया।इसी तरह चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा के उत्पादन में भी 2-5 गुना तक वृद्धि हुई।


       1951 में भारत का कुल खाद्यान  उत्पादन महज 5 करोड़ तन था, जो हरित क्रांति की बदौलत आज बढ़कर 28.5 करोड़ टन तक पहुंच गया है।अब भारत न केवल अपनी खाद्यान्न जरूरते पूरी कर पा रहा है, बल्कि अधिशेष अनाज बेचकर विदेशी आय भी प्राप्त कर रहा है। यह हरित क्रांति की ही देन है।

हरित क्रांति के लाभ-
- खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता।
- प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि।
- सिंचित क्षेत्र में वृद्धि।
- कृषकों की आय में वृद्धि।
- कृषि का व्यवसायीकरण।
- औद्योगिक कच्चे माल की आपूर्ति।
- वैज्ञानिक कृषि को बढ़ावा।
- कृषि शोध व अनुसंधान में प्रगति।


हरित क्रांति की हानियाँ-
- उत्पादन वृद्धि में क्षेत्रीय असमानता।
- केवल गेंहू व चावल के उत्पादन में वृद्धि।
- कपास, तिलहन, दाल पर नगण्य प्रभाव।
- दक्षिण भारत अछूता।
- कीटनाशकों के बेजा इस्तेमाल से नुकसान।
- केंसर के बढ़ते केस।
- भूमि की उर्वरता पर दुष्प्रभाव।



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