वराहमिहिर - ज्योतिष शास्त्र के जनक
परिचय-
अवन्ति(उज्जयिनी) के 6ठी शताब्दी(505-587 ई.) के प्रख्यात खगोलज्ञ व ज्योतिष शास्त्र के प्रकांड ज्ञाता वराहमिहिर राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबारी नवरत्नों में शामिल थे। वराह मिहिर का जन्म उज्जैन के समीप 'कपिथा गाँव' में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता आदित्यदास सूर्य के उपासक थे। उन्होंने मिहिर को (मिहिर का अर्थ सूर्य) भविष्य शास्त्र पढ़ाया था। अनुश्रुति है कि मिहिर ने राजा विक्रमादित्य के पुत्र की मृत्यु 18 वर्ष की आयु में होगी, यह भविष्यवाणी की थी। हर प्रकार की सावधानी रखने के बाद भी मिहिर द्वारा बताये गये अनुसार ही 18 वे वर्ष में एक वराह के हाथों राजकुमार की मृत्यु हो गयी। राजा ने मिहिर को बुला कर कहा, 'मैं हारा, आप जीते'। मिहिर ने नम्रता से उत्तर दिया, 'महाराज, वास्तव में मैं तो नहीं 'खगोल शास्त्र' के 'भविष्य शास्त्र' का विज्ञान जीता है'। महाराज उन्हें 'वराह' की उपाधि प्रदान की और उसी दिन से मिहिर वराह मिहिर के नाम से जाने जाने लगे।
उन्होंने ज्योतिष व खगोलशास्त्र पर कई ग्रंथ लिखे:-पंचसिद्धान्तिका, वृहज्जातक, लघुज्जातक, वृहत्सहिता, वृहतविवाहपटल, लघुविवाहपटल, कुतूहलमन्जरी, योग यात्रा, लग्नवरही, समास संहिता आदि।
इनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ था- पंचसिद्धान्तिका, जो कि भारतीय तंत्र ज्योतिष का प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।इसमें कुल 5 सिद्धान्त है-सूर्य,रोमक,पोलिश,वशिष्ठ, व पितामह।वराहमिहिर ने इनमे अधिमास, मुहूर्त, ग्रह गति गणना, लग्न, होरा आदि के बारे में विस्तार से लिखा है। अपनी पुस्तक पंचसिद्धान्तिका में मिहिर स्वयं लिखते है- " ज्योतिष शास्त्र एक अथाह सागर है, हर कोई इसे आसानी से पार नहीं कर सकता।मेरी पुस्तक एक सुरक्षित नाव है, जो इसे पढ़ेगा, यह उसको इस सागर के पार ले जाएगी।"
इनका दूसरा प्रमुख ग्रंथ है - वृहत्संहिता। इसमे ज्योतिष के साथ स्थापत्य, मौसम, बादल, फसल, वर्षा आदि विविध बातों का भी जिक्र हैं।
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